Homosexuality and Unnatural Sex Relations-21 : अप्राकृतिक संबंधों के लिए नशीली दवाएं, इंजेक्शन व उत्तेजक दवाइयां
. अप्राकृतिक संबंधों के लिए नशीली दवाएं, इंजेक्शन व उत्तेजक दवाइयां
अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने वाले या समलैंगिक संबंध अपनाने वाले अधिकांश लोग नशीली दवाईयों, इंजेक्शन व कामोत्तेजक दवाईयों का भी बहुत इस्तेमाल करते हैं। ये लोग सेक्स के दौरान लंबी रेस का घोड़ा बनना चाहते हैं तथा इनकी दिली इच्छा होती है कि सेक्स का दौर काफी लंबा चले और वे इस पूरा लुत्फ उठाएं।
न्यूयार्क टाइम्स में लगभग एक वर्ष पहले प्रकाशित एक लेख पर अगर यकीन किया जाए तो पता चलता है कि अप्राकृतिक यौन संबंध या समलैंगिक संबंध बनाना जिनकी आदत या शौक है, वे सेक्स के दौरान अधिक से अधिक उत्तेजना चाहते हैं। बायसेक्सुअल लोग तो इससे भी कहीं आगे हैं। ऐसे लोग प्रायः ग्रुप सेक्स या गु्रप पार्टियों में शामिल होते हैं, जहां वे पुरुष और महिला दोनों से ही सेक्स करते हैं। सेक्स का यह दौर या पार्टी लंबी से लंबी चले, इसलिए ये ऐसी उत्तेजक दर्वायों का सेवन करते हैं या नशीले इंजेक्शन लगाते हैं, जो सेक्स के खेल को लंबा खींच सकें।
दवाईयों से भरा बाजार
अप्राकृतिक यौन संबंध या समलैंगिक यौन संबंध बनाने वालों को भारत में शौकीन लोग भी कहा जाता है। ये लोग अधिक से अधिक अप्राकृतिक सेक्स करने के लिए हर समय तैयार मिलते हैं। ऐसे लोगों के लिए जहां ड्रग्स का एक बहुत बड़ा बाजार है, वहीं नशीले इंजेक्शन व दवाईयों की भी बहुत बड़ी बाजार है। दवाईयां जहां आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथी और ऐलोपैथी आदि सभी पैथियों में मौजूद हैं, वहीं कोई गुप्त रोग हो जाने पर इनके लिए सेक्स क्लिनिक या लुकमानी दवाखाने भी खुले हुए हैं, जिनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
शहरों में अखबार, स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं व रेलवे लाइन के किनारे दीवारों आदि पर गुप्त रोगों के इलाज का प्रचार होता है। गली-मुहल्लों में दीवारों और बिजली के खंभों पर हैंडबिल चिपका कर सेक्स से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने का प्रचार किया जाता है। रेल कंपार्टमेंट में भी ऐसी क्लिनिकों का प्रचार करते हैंडबिल देखे जा सकते हैं। इन सारे इश्तिहारों में नामर्दगी, शीघ्र पतन, स्वप्नदोष और हर तरह के गुप्त रोगों के शर्तिया इलाज का दावा किया जाता है।
सेक्स क्षमता बढ़ाने के नाम पर कई तरह की दवाइयाँ धड़ल्ले से बिक रही हैं। इन दवाइयों के खरीदार नौजवानों से लेकर उम्रदराज पुरुष तो हैं ही, अब महिलाएं भी ऐसी दवाओं के सेवन में पीछे नहीं हैं। ये दवाएँ कैप्सूल, स्प्रे, जेली, तेल और कैंडी के रूप में बाजार में उपलब्ध हैं। इन दवाओं की बिक्री से करोड़ों रुपय
का गोरखधंधा धड़ल्ले से चल रहा है।
अपने आप को यौन रोगों का माहिर डॉक्टर बताने वाले दरअसल मरीज को किसी तरह की दवा नहीं देते। इसके लिए किसी तरह की दवा बनी भी नहीं है। विटामिन-ई को कुछ डॉक्टर अवश्य सेक्स-टॉनिक के रूप में इस्तेमाल करते हैं। 1960 से 1970 के बीच चूहों पर किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों के बाद यह बात गलत ढंग से कही गई कि विटामिन-ई के सेवन से इंसान की सेक्स क्षमता को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन 1978 में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने इस बात को साबित कर दिया कि इससे सेक्स की ताकत पर कोई असर नहीं पड़ता है। कुछ सेक्स क्लिनिक आयुर्वेदिक दवा के नाम पर पिस्ता, बादाम वगैरह जैसे मेवों का इस्तेमाल करते हैं।
आकर्षक ब्रांड नामों से सजीं, सेक्स की ताकत बढ़ाने का दावा करतीं कंपनियां लोगों को सरेआम लूट रही हैं। ये कंपनियाँ सेक्स पावर बढ़ाने, शीघ्र पतन रोकने और अंगों की कमजोरी को दूर करने का दावा करती हैं। लोग भी इनके झांसे में आसानी से आ जाते हैं, जबकि सच बात तो यह है कि ये दवाएं कितनी असरदार हैं, कोई नहीं जानता।
चूँकि ज्यादातर दवाइयां आयुर्र्वेिदक होती हैं और इनके बनाने को लेकर कोई खोज भी नहीं की गई होती है, इसलिए इनकी विश्वसनीयता पर हमेशा संदेह रहता है। ज्यादातर दवाओं के पैकेट पर लाइसेंस नंबर तक नहीं लिखा होता है। इन दवाओं का कब, कितना असर होगा, यह खरीदने वाला तो क्या, इन्हें बेचने या बनाने वाला भी नहीं जानता है।
ज्यादातर दवाएं फर्र्जी कंपनियों द्वारा बनाई जाती हैं। इतना तो तय है कि इक्का-दुक्का दवाओं में ही शिलाजीत, सफेद मूसली और काैंच के बीज जैसी चीजों का इस्तेमाल होता है। ज्यादातर दवाओं पर उनको बनाने में इस्तेमाल की गई चीजों का ब्यौरा भी नहीं लिखा जाता है। दवा कंपनियों द्वारा केमिस्टों को भी कई तरह की स्कीमों और भारी कमीशन के अलावा उधार देकर इन दवाइयों को बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
यौन विशेषज्ञों के मुताबिक सेक्स हार्मोन का नाम टेस्टोस्टेरॉन है। यौन उत्तेजना के लिए यही जिम्मेदार है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, इसका असर कम होता जाता है। दवाओं के रूप में इसका इस्तेमाल आज तक कुछ मामलों में ही कामयाब हो सका है। जैसे-जब शरीर में सचमुच सेक्स हार्मोन की कमी हो या सेक्स लक्षर्ोिं के विकास में नाकामी दिखाई देती हो या फिर बढ़ती उम्र में टेस्टोस्टेरॉन की मात्रा घट जाने का सबूत मौजूद हो।
अगर इसका इस्तेमाल बिना सोचे-समझे किया जाए, तो यह शुक्रार्ुिओं की तादाद को कम भी कर सकता है। यह लीवर के काम में भी गड़बड़ी पैदा कर सकता है और कैंसर होने का खतरा भी बढ़ा देता है। महिलाओं में भी इसके इस्तेमाल के कई असर दिखाई पड़ सकते हैं। जैसे- बालों का गिरना या गंजापन होना, क्लिटोरिस का बढ़ना, आवाज भारी होना वगैरह। इसलिए जब तक जरूरी लक्षर्ोिं और परीक्षर्ोिं से टेस्टोस्टेरॉन की कमी का पक्का सबूत नहीं मिल जाता, तब तक उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
ज्यादातर दवाएं पुरुषों के लिए बनाई जाती हैं। महिलाओं के लिए भी कुछ दवाएं हैं। महिलाओं के लिए जो दवाएं बाजार में उपलब्ध हैं, उनके इश्तिहारांें में सबसे पहली बात यह लिखी होती है कि नारीत्व की संपूरर््िता व आत्मविश्वास के लिए इसे अपनाएं। इसके बाद अच्छी व सुडौल काया बनाने के दावे होते हैं। इनमें कुछ दवाएं कैप्सूल के रूप में उपलब्ध हैं और कुछ मसाज ऑइल के रूप में। महिलाओं के लिए उपलब्ध कई दवाओं के इश्तिहार में खास तौर पर बड़े अक्षरों में यह जरूर लिखा जाता है कि माहवारी की समस्या में कारगर। साथ में फिर बड़ी चालाकी से चेतावनी के रूप में इश्तिहार का फोकस इस बात पर किया जाता है कि सावधान, गर्भावस्था में प्रयोग वर्जित है, गर्भ गिर सकता है।
आमतौर पर हर महिला अपने इस खास तत्व को और अधिक बेहतर रूप में पाना चाहती है। यही बात पुरुषों के लिए भी सही है। वह भी अधिक से
अधिक जवां रहना चाहेंगे। कुछ सेक्स दवाएं महिलाओं या पुरुषों को उनकी कुदरती क्षमता से आगे बढ़कर ‘वाइल्ड’ होने के लिए उकसाती नजर आती हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि अप्राकृतिक यौन संबंध रखने वाले तथा समलैंगिक लोग स्वयं को वाइल्ड ही बनाना चाहते हैं।
हम सभी जातने हैं कि बंगाली चिकित्सकों ने जगह-जगह गुदा रोगों को ठीक करने के लिए क्लिनिक खोल रखे हैं। एक बंगाली चिकित्सक ने हमें बताया कि उनके पास कम से कम पांच युवा रोजाना ऐसे आते हैं, जिनकी गुदा अप्राकृतिक यौन संबंधों के कारण क्षतिग्रस्त हो जाती है। इन युवाओं का कहना होता है कि इनकी गुदा को जल्द से जल्द ठीक किया जाए। जब ऐसे युवाओं से इस तरह के संबंध न बनाने को कहा जाता है तो वे साफ कह देते हैं कि इसके बिना उनका काम नहीं चलने वाला।
अप्राकृतिक यौन संबंधों व समलैंगिकता के शिकार अनेक लोग नीम हकीमों के चक्कर में फंस जाते हैं, जो उनके रोग को अति भयानक बताकर उनसे मनमाने पैसे वसूल लेते हैं तथा ठीक उपचार भी नहीं कर पाते।
एड्स से बचने के लिए रोजाना दवाई
अनेक अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने वालों या समलैंगिक लोगों को एड्स से बचने के लिए रोजाना दवाई खाते हुए भी देखा गया है। शायद आपको याद होगा कि आज से लगभग 20.25 साल पहले एक फैशन सा चला था कि मलेरिया रोग से बचने के लिये हर सप्ताह एक टैबलेट ले लें तो मलेरिया से बचे रहा जा सकता है।दृ इस फैशन का जमकर विरोध भी हुआ था। उन दिनों मीडिया भी इतना चुस्त-दुरुस्त नहीं था, इसलिए अपने आप को समझदार समझने वाले जीव कुछ अरसा तक यह गोली खाते रहे...लेकिन बाद में धीरे धीरे यह मामला ठंडा पड़ गया। आजकल किसी को कहते नहीं सुना जाता कि वह मलेरिया से बचने के लिये कोई गोली आदि खाता है।
आज इस तरह का प्रचार भी जोरों पर चल रहा है कि सेक्स में जिन लोगों का हाई-रिस्क बिहेवियर है जैसे कि समलिंगी पुरूष, अगर ये रोजाना एंटी-वायरल दवाई की एक खुराक ले लेते हैं तो इन को एचआईवी संक्रमर् िहोने का खतरा लगभग 44 फीसदी कम हो जाता है। ऐसा बताया जा रहा है कि समलैंगिक पुरुषों में रोजाना दवाई लेने से खतरा कम हो सकता है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर ऐसा हो सकता है, तो फिर अन्य हाई-रिस्क लोगों जैसे की सैक्स वर्करों, ड्रग-यूजरों (जो लोग ड्रग्स लेने के लिये एक दूसरे की सुई इस्तेमाल करते हंैं) में भी रोजाना यह दवाई लेने से यह खतरा तो कम हो ही जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि मेडीकल साइंस ने अभी ऐसी किसी दवाई की पुष्टि नहीं की है, जिसकी खुराक नियमित तौर पर लेने से एचआईवी का संक्रमण रुक सकता हो। कहने की जरूरत नहीं है कि कुछ दवा कंपनियों ने इस तरह का प्रचार किया है ताकि वे इस तरह की दवाईयो को महेंगे दामों पर बेचकर अपना स्वार्थ पूरा कर सकें।
सबसे अच्छा उपचार
इस संबंध में हमारे देश के समझदार लोग एकमत से कहते हैं कि आखिर हाई-रिस्क सेक्स किया ही क्यों जाए? ऐसी मजबूरी पैदा की ही क्यों जाए कि एचआईवी से बचाव की बात सोचनी पड़े। उनका कहना है कि भारत के पास विश्व की समस्त विषय समस्याओं के साथ-साथ इस समस्या का भी समाधान है।
ऐसा हो ही क्यों कि समलैंगिक पुरूष हाई-रिस्क में लगे रहें, नशा करने वाले नशे में लिप्त रहें और एचआईवी संक्रमर् िसे बचने के लिये रोजाना दवाई लेनी पड़े। क्यों न वह अपनी लाइन ही बदल ले। भारत के पास योगा है, दिमाग को रिलैक्स करने वाले व्यायाम हैं। अध्यात्म की शक्ति है और इसके साथ-साथ संयम और अनुशासन की शक्ति है। इसकी बदौलत क्यों न इंसान की फितरत ही बदल दी जाए।
निःसंदेह यह शक्ति भारत के पास है। लेकिन इसका प्रयोग आखिर कितने लोग करना चाहंेगे, यह बड़ा सवाल है। आज जहां अप्राकृतिक यौन संबंधों व समलैंगिकता के माध्यम से जहां अधिक से अधिक सेक्स करने की होड़ लगी हुई है, वहां इस शक्ति को कितने लोग प्राप्त करने का प्रयास करेंगे, कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे शौकीन लोग न जाने कितनी तरह की नशीली दवाइयां खा रहे हैं, न जाने कितने इंजेक्शन लगा रहे हैं, स्पे्र का इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर उत्तेजक च्यूंगम आदि खा रहे हैं तथा न जाने किस-किस तरह की बीमारियों से ग्रस्त तथाकथित गुप्त रोगों के पास जाकर लुट रहे हैं, यह जगजाहिर हो चुका है। अगर इन्हें जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं और इन्हें जागरूक किया जाए, तो निःसंदेह ये जानलेवा बीमारियों की चपेट में आने से बच सकते हैं।
J.K.Verma Writer
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