Top Secrets of Kamsutra-5 : कामसूत्र के टॉप सीक्रेट्स-5 : हम धनवान क्यों नहीं बन पाते

 . हम धनवान क्यों नहीं बन पाते

 आचार्य  वात्सयायन ने कामसूत्र में इस बात का भी उल्लेख किया है कि काफी प्रयास करने के बाद भी हम धनवान क्यों नहीं बन पाते। वे कहते हैं कि बार-बार प्रयत्न करने पर भी धन की प्राप्ति नहीं हो पातली और कई बार बिना प्रयत्न के ही खजाने हाथ लग जाते हैं। इसलिए अर्थसिद्धि के जो उपाय हैं, उनके बारे में निश्चित तौर से यह नहीं कहा जा सकता कि वे सही हैं या गलत। अत: इन उपायों के लिए किसी अर्थशास्त्र की आवश्यकता नहीं है। 

सब काल का किया धरा है :

    आचार्य कहते हैं : यह सब काल का किया धरा होता है। सच यह है कि मनुष्य काल के अधीन है। जो कुछ भी होता है, वह समयानुसार ही होता है। धन, विजय, सुख और हानि, पराजय और दु:ख ये छह के छह पदार्थ काल के ही अधीन हैं। इनके लिए ज्यादा प्रयत्न करने का प्राय: कोई लाभ नहीं मिल पाता।

काल ने बलि को इंद्र बनाया =

    वे कहते हैं कि काल ने बलि को इंद्र बना दिया। उसी ने ही उसे पद से हटा भी दिया। अगर काल चाहता तो उसे फिर से इंद्र बना सकता था। तभी तो कहते हैं कि काल ही प्राणियों को जन्म देता है और वही उसे समाप्त भी करता है। सबके सो जाने पर वह जागता रहता है। अधिकांश लोग इस काल को ईश्वर भी कहते हैं। 

मनुष्य सब कर्मानुसार ही करता है :

    आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह कर्मानुसार ही करता है। इस कारण उपाय को मानना चाहिए। समय से या उपाय से जब भी अर्थसिद्धि होती है, उसके लिए मनुष्य ने जो भी कुछ किया हो, उसे कर्मानुसार ही मानना चाहिए क्योंकि उपाय और समय दोनों में ही कर्म घुसा हुआ है। बिना उपाय के कर्म भी अर्थसिद्धि नहीं कर सकता, इसलिए उपाय को मानना चाहिए।

आचार्य कहते हैं कि निश्चित रूप से मिलने वाला धन भी उपाय से ही मिलता है। अत: निकम्मे व्यक्ति का कभी भी कल्याण नहीं हो सकता। ऐतरेय ब्राह्मण ने एक गीत तैयार किया था, जिसका अर्थ था चलते रहो-चलते रहो। इस गीत को इंद्र ने पुरुष भेष धारण करके हरिश्चंद्र के अल्पायु पुत्र रोहित को सुनाया था और उसे दीर्घायु प्रदान की थी। गीत का सार कुछ इस प्रकार से है :-

० जो श्रम से नहीं थकता, उसे ही लक्ष्मी प्राप्त होती है। हाथ पर हाथ रखकर बैठने वालों को पाप दबोच लेता है। इंद्र उसी का मित्र है, जो बराबर चलता रहता है। इसलिए चलते रहो। चलते रहो।

० जो व्यक्ति गतिशील, क्रियाशील होता है, उसकी जंघाओं में पुष्प खिलते हैं। उसकी आत्मा श्रम से विभूषित होकर फल प्राप्त करती है। चलने वालों के पाप थककर सो जाते हैं, इसलिए चलते रहो। चलते रहो।

० बैठे हुए आदमी का नसीब भी बैठ जाता है। खड़े रहने वाले का नसीब भी उठ खड़ा होता है। सोये हुए व्यक्ति का नसीब भी सो जाता है। इसी तरह उठकर चलने वाले का नसीब भी चलने लगता है। इसलिए चलते रहो। चलते रहो। 

० चलते वाला मनुष्य ही मधु पाता है। चलता हुआ मनुष्य ही स्वादिष्ट फल चखता है। सूर्य का परिश्रम देखो, जो नित्य चलते हुए कभी भी आलस्य  नहीं करता। इसलिए चलते रहो। चलते रहो। 

० सोने वाले का नाम कलियुग है। अंगड़ाई लेने वाले का नाम द्वापर है। खड़ा रहने वाला त्रेता है और चलने वाला सतयुग है। इसलिए चलते रहो। चलते रहो। 

निष्कर्ष यही निकलता है कि चलना ही जीवन है। जो उद्यमी है, परिश्रमी है और क्रियाशील है, उसी को लक्ष्मी प्राप्त होती है। उसी के कार्य सिद्ध होते हैं।

उपनिषदों में भी कहा गया है कि जिन व्यक्तियों में संकल्प शक्ति नहीं है, जो प्रमादी और मिथ्याचारी हैं, उन्हें आत्मदर्शन नहीं हो सकता। और जो कमर कसकर अर्थ सिद्धि के लिए जुट जाते हैं, इंद्र उन्हीं का मित्र है। 

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