Top Secrets of Kamsutra-10 : कामसूत्र के टॉप सीक्रेट्स-10 : आलिंगन कब, कहां, कैसे? कुल कितने प्रकार के होते हैं आलिंगन?

 आलिंगन कब, कहां, कैसे? कुल कितने प्रकार के होते हैं आलिंगन?

आचार्य वाभ्रव्य कहते हैं कि जो स्त्री-पुरुष पहले कभी नहीं मिले हैं, उनमें आपस के प्रेम को प्रकट करने के लिए चार प्रकार के आलिंगन बताए गए हैं इन आलिंगनों का प्रयोग वे एक दूसरे को अपने ओर आकर्षित करने के लिए करते हैं। ये  चार प्रकार के आलिंगन निम्रलिखित हैं :

1. स्पृष्टक  2. विद्धक  3. उद्घृष्टक  4.पीडि़तक

इन आलिंगनों में जिसका जो नाम है, उसका वही काम है। जैसा नाम है, वैसा ही उसमें गुण है। इनका अलग-अलग विवरण आगे दिया जा रहा है।

1.  स्पृष्टक आलिंगन : पुरुष जिस स्त्री को चाहता हो तथा जिसे पाने के लिए वह प्रयत्न कर रहा हो, वह जब सामने से आ रही हो, तो किसी बहाने उसके शरीर से अपना शरीर छुआ दे, तो उसे स्पृष्टक  आलिंगन कहते हैं।

2. विद्धक आलिंगन : स्त्री जिस पुरुष को चाहती हो, वह जब एकांत में खड़ा या बैठा हो, तो किसी वस्तु को रखने या लेने के बहाने अपने वक्षों को उससे छुआ दे या उसे अपने वक्षों से धक्का देते हुए उसे पास से निकल जाए और पुरुष भी उसे तरीके से पकडक़र भींच दे, तो उसे विद्धक आलिंगन कहते हैं।

3. उद्घृष्टक आलिंगन : जहां मनुष्यों की भीड़ हो या जहां अंधेरा हो या जहां एकांत हो, ऐसी जगह धीरे-धीरे चलते हुए जब पुरुष और स्त्री एक दूसरे से टकराते हैं या रगड़ते हैं, तो उसे उद्घृष्टक आलिंगन कहते हैं।

4. पीडि़तक आलिंगन : जब यही उद्घृष्टक आलिंगन दीवार या खंभे के सहारे हो, तो शरीर की रगड़ लगने से, एक दूसरे का पीडऩ होने से पीडि़तक आलिंगन बन जाता है। अर्थ यह है कि दीवार या खंभे से पुरुष और स्त्री का एक दूसरे को कसकर दबाना ही पीडि़तक आलिंगन कहलाता है।

उद्घृष्टक और पीडि़तक आलिंगन के प्रयोग तब होते हैं, जब पुरुष और स्त्री एक दूसरे के रंग-ढंगों से दिल की बात का पता लगा चुके होते हैं। जिन्हें इस बात का पता लग चुका होता है कि यह मुझे चाहती है और मैं इसे चाहता हूं।

संभोग समय के आलिंगन अलग होते हैं

स्त्री-पुरुष के संभोग के समय आलिंगन भी चार प्रकार के ही होते हैं।

1. लतावेष्टिक  2. वृक्षाधिरूढक़  3. तिलंतण्डुलक  4.क्षीरजलक

                                  1. लतावेष्टिक आलिंगन 

जैसे बेल वृक्ष से लिपटती है, ठीक उसी प्रकार जब स्त्री पुरुष के सामने खड़ी होकर, उसकी बगलों और गले में हाथ उालकर उससे लिपट जाती है तथा उसके मुंह को चूमने के लिए उसकी गर्दन को पकडक़र नीचे की ओर झुकाती हैख् उसके बाद उसके  जोश को बढ़ाकर धीरे-धीरे सी-सी करती हुई उसके मुख सौंदर्य को निहारती है, तो उस आलिंगन को लतावेष्टिक आलिंगन कहते हैं।

2. वृक्षाधिरूढक़ आलिंगन

जैसे वृक्ष पर  चढ़ा जाता है, उसी प्रकार जब स्त्री अपने एक पैर से पुरुष का एक पैर दबाए तथा दूसरे पैर को पुरुष के दूसरे पर लाद दे या फिर अपनी टांग से पुरुष की टांग को चारों ओर से लपेट ले। इसके साथ ही अपना एक हाथ पुरुष की पीठ पर रखकर दूसरे हाथ से उसके कंधे और गदन को नीचे की ओर झुकाए और धीरे-धीरे सिसकारियां भरती हुई पुरष का मुंह चूमने के लिए उस पर चढऩे की चेष्टा करे तो उसे आलिंगन को वृक्षाधिरूढक़ आलिंगन कहते हैं।

ऊपर दिए हुए दोनों प्रकार के आलिंगन खड़े होकर किए जा सकते हैं।

3. तिलतडुलक आसन

यह आलिंगन तब किया जाता है, जब स्त्री और पुरुष दोनों पलंग पर लेटे हुए हों। स्त्री पुरुष के बाईं और और पुरुष स्त्री के दायीं ओर हो। ऐसे में पुरुष अपनी बाईं जांघ को स्त्री की दोनों जांघों के बीच रख दे तथा अपने बाएं हाथ को स्त्री की दाहिनी बगल में डालकर उसे अपनी ओर खींचे। बिल्कुल इसी प्रकार स्त्री भी करे।

यूं दिखे कि स्त्री और पुरुष जो आलिंगन कर रहे हैं, वह संघर्ष के लिए है। इस प्रकार आलिंगन में भुजाएं तथा टांगें तिल और तण्डूल यानि चावल की तरह घुल-मिल जाती हैं, इसलिए इसे तिलतण्डुलक आसन कहते हैं।

                4. क्षीर-जलक आलिंगन

जब स्त्री-पुरुष में जोश बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तब उन्हें अपना होश ही नहीं रहता, तो वे हड्डियों के टूटने की या दूसरी किसी प्रकार की हानि की परवाह किए बिना इस तरह एक दूसरे से लिपटते हैं कि एक दूसरे में समा ही जाएंगे, तो ऐसे आलिंगन को क्षीर-जलक आलिंगन कहते हैं।

इस आलिंगन में पुरुष-स्त्री यूं एक दूसरे में घुसने का प्रयास करते हैं, जैसे पानी में घुस रहे हों। यह आलिंगन दो प्रकार का हो सकता है।

1. जब स्त्री पुरुष की गोद में बैठकर अपनी दोनोंं टांगें पुरुष की कमर में फंसा दे और उसकी छाती से अपनी छाती चिपका दे, फिर वे दोनों एक दूसरे को कसकर दबाएं।

2. जब स्त्री-पुरुष आमने-सामने लेटे हुए हों और इस प्रकार एक दूसरे से बुरी तरह से लिपटकर भीतर समाने का प्रयास करें।

इस प्रकार यह आसन लेटे और बैठे दोनों ही प्रकार से हो सकता है। हाथों के बीच में सीने से लगाकर आपस में अत्यंत भींचकर स्त्री-पुरुष यूं लगते हैं, जैसे दूध और पानी एक हो गए हों। इसलिए इस आलिंगन को क्षीर-जलक आलिंगन कहा गया है।

क्षीर-जलक और तिलतण्डुलक आलिगन का समय :

ये दोनों प्रकार के आलिंगन कामवासना के जोश बढ़ जाने के समय होते हैं। जब पुरुष का लिंग तनाव में आकर तन जाता है तथा स्त्री की योनि भीतर से काफी गीली हो चुकी होती है, ऐसे में संभोग क्रिया शुरू करने से पहले ऐसे आलिंगनों का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रकार आचार्य वाभ्रव्य ने आठ प्रकार के आलिंगन बताए हैं, जिनका वर्णन कर दिया गया है।

आचार्य स्वर्णनाभ के चार और प्रकार के आलिंगन

आचार्य सुवर्णनाभ इन आठों प्रकार के आलिंगनों के अलावा भी चार अन्य प्रकार के आलिंगन बताए हैं।

1. उरूपगूहन आलिंगन  2. जघनोपगूहन आलिंगन  3. स्तन आलिंगन  4. ललाटिका आलिंगन

1. उरूपगूहन आलिंगन

स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे की ओर मुंह करके लेट जाएं। जब पुरुष स्त्री की एक या दोनों टांगों को अपनी जांघों के बीच  पूरी ताकत से भींचे या फिर इसी प्रकार स्त्री करे तो इसे उरूपगूहन आलिंगन कहते हैं।

इस प्रकार अपने-अपने समय में दोनों ही इसका प्रयोग कर सकते हैं। कुछ ऐसा भी कहते हैं कि दोनों में से जिसकी जांघें बड़ी और मोटी होंगी, वही इसका प्रयोग कर सकेगा। संभाग के समय इस प्रकार जांघें दबाने से अत्यंत आनंद आता है।

2. जघनोपगूहन आलिंगन

जब स्त्री-पुरुष एक दूसरे की ओर मुंह करके लेटे हुए हों, स्त्री की कामवासना जागृत हो चुकी हो, परंतु पुरुष की न हुई हो, तब स्त्री-पुरुष की जांघ को अपनी जांघ से दबाते हुए उसके ऊपर लेट जाए, फिर उसके मुंह को चूमे, उसके सभी अंगों में नाखून गड़ाए और दांतों से काटे तो इसे जघनोपगूहन आलिंगन कहते हैं।

इस आलिंगन में स्त्री अपनी योनि के भीतर पहुंच चुके पुरुष के लिंग को घोड़ी की तरह भींचकर दूसरे प्रयत्न कर सकती है। यह एक विधि है।

इसमें स्त्री नाभि से लेकर जंघाओं तक के अपने शरीर को पुरुष के शरीर के साथ भींच कसती है। उसके ऐसा करने से पुरुष को उसके सुंदर व नरम नितंब दिखाई देेंगे, जिससे उसकी काम-वासना भडक़ उठेगी। यह दूसरी विधि है।

3. स्तन आलिंगन

जब स्त्री अपनी छाती को पुरुष की छाती से सटाकर स्तनों का भार उसके सीने पर रख दे, तो इसे स्तन आलिंगन कहते हैं। इस प्रकार पुरुष को स्पर्श का एक अलौकिक आनंद मिलता है।

4. ललाटिका आलिंगन

जब स्त्री-पुरुष दोनों के मुंह के सामने मुंह, आंखों के सामने आंखें करके माथे से माथा दबाते हैं,तो इसे ललाटिका आलिंगन कहते हैं। इस आलिंगन का प्रयोग अधिकतर स्त्रियां करती हैं, इसलिए इसका नाम ललाटिका रखा गया है। इसमें वह अपने साथी पुरुष के मुंह से मुंह मिला लेती है, आंखों से आंखें मिला लेती है, नाक से नाक मिला लेती है तथा अपने माथे को उसके माथे से दो-तीन बार  रगडऩे के बाद अपने माथे का भार उसे माथे पर रख देती है।

संवाहन को भी आलिंगन माना है

एक आचार्य ने संवाहन को भी एक तरह का आलिंगन माना है। उनका कहना है कि शरीर को दबाने से, मालिश करने से या उबटन मलने से भी एक दूसरे के शरीर को सुख प्राप्त होता है, इसलिए इसे भी आलिंगन मान लेना चाहिए।

  क्या कहते हैं वात्स्यायन

आचार्य वात्स्यायन संवाहन को आलिंगन नहीं मानते। उनका कहना है कि यद्यपि शरीर दबाने, मालिश करने या उबटन मलने से स्पर्श होता है तथा सुख मिलता है, लेकिन इसका समय कुछ और ही होता है तथा आलिंगनों का कुछ और ही होता है। इसलिए इसे आलिंगन नहीं कहा जा सकता।

आलिंगनों का सम्मान किया जाना चाहिए

आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि आलिंगनों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इसका कारण वे कुछ इस तरह बताते हैं :

० इन सभी आलिंगनों की सारी विधि को किसी से पूछने से, किसी से सुनने से तथा किसी को बताने से संभोग की इच्छा पैदा हो जाती है। अगर इन्हें संभोग के समय काम में लाया जा रहा है, तो कहना ही क्या है।

     जिन आलिंगनों का कामशास्त्र ने विवरण दिया है, वे सभी शास्त्रानुसार हैं। इनके अलावा भी आलिंगन की कुछ अन्य विधियां भी हो सकती हैं, जिन्हें अशास्त्रानुसार कहा जाएगा। आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि आलिंगन के जिन तरीकों का शास्त्र में वर्णन नहीं है, यदि वे संभोग के समय आनंद को बढ़ाने वाले हों, तो उनका भी आदर के साथ प्रयोग कर लेना चाहिए। यह समझकर कि शास्त्र के अनुसा नहीं है, इनका निरादर नहीं करना चाहिए। जिन आलिंगनों का संभोग से संबंध हो, वे सभी संभोग के कारण वाले कहलाते हैं।

इसका कारण बड़ा ही स्पष्ट है। जिन स्त्री-पुरुषों का संभोग करने का जोश अभी नहीं बढ़ा, वे ही शास्त्र के बारे में सोच सकते हैं। लेकिन जो पूरे जोश में आ चुके हों और जिनका आनंद काफी बढ़ गया हो, उन्हें शास्त्रों का होश ही कहां रहता है। तब तो स्त्री-पुरुष अपने आप को ही भूल जाते हैं। वे इतने अंधे हो जाते हैं कि अपने लाभ-हानि के बारे में भी नहीं सोच पाते। शास्त्रों के बारे में तो सोचेंगे ही क्या?

इस प्रकार आलिंगन की सभी विधियों के बारे में विस्तार से बता दिया गया है। अगले ब्लॉग में चुंबन की विभिन्न प्रक्रियाओं के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। यह बताया जाएगा के चुंबन कितने प्रकार के होते हैं? उन्हें शरीर के किस-किस अंग पर कब-कब किया जाना चाहिए?

Copywrite : J.K.Verma Writer
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