Top Secrets of Kamsutra-14 : कामसूत्र के टॉप सीक्रेट्स-14 : अलग-अलग प्रदेशों में संभोग करने की प्रचलित विधियोंं का वर्णन
अलग-अलग प्रदेशों में संभोग करने की प्रचलित विधियोंं का वर्णन
विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित संभोग-क्रियाओं की विधियों का वर्णन इस ब्लॉग में किया जा रहा है। आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि इन विशेष विधियों का प्रयोग करके संभोग का एक अनूठा आनंद लिया जा सकता है। अगर नायक यह चाहता है कि नायिका संभोग के समय उसे मनचाहा आनंद दे, तो उसे उन विधियों का प्रयोग करना चाहिए, जो नायिका के प्रदेश में प्रचलित हो और जिनके प्रयोग में वह नायिका पूरी तरह दक्ष हो। ठीक यही बात नायिका पर भी लागू होती है। अलग-अलग देशों में प्रचलित अलग-अलग संभोग विधियों का वर्णन आगे कर रहे हैं।
जो बात देश के रहने वालों को अनुकूल बैठे, उसका पूरा ध्यान रखकर उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। यह अनुकूलता दो तरह से होती है। एक तो स्वभाव से तथा दूसरी स्थान से।
चुंबन, आलिंगन, नखों व दांतों का प्रयोग, जिस स्थान के लिए जो अनुकूल हो, वहां उसी का प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ ही अपने प्रियतम या प्रियतमा के स्वभाव को भी अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।
वात्स्यायन की बात का असली मतलब रति रहस्य में यूं बताया गया है : जब स्त्रियां संभोग में संतुष्ट नहीं हो पातीं, उनसे पहले ही पुरुष स्खलित हो जाते हैं, तो पुरुषों को चाहिएकि हमारी बताई गई विधियों को प्रयोग में लाकर स्त्रियों को पहले स्खलित कर दे।
जो विधियां देश, काल और प्रकृति के अनुसार होती हैं, उनका प्रयोग करना युवतियों को जल्दी ही स्खलित तथा तृप्त किया जा सकता है। विभिन्न प्र्रदेशों की स्त्रियां किस स्वभाव और प्रकृति की होती हैं, इसका विस्तृत विवरण इस प्रकार है:-
मध्यम देश की स्त्रियां :
भारत के पुराने भूगोल के अनुसार घग्गर नदी और सरस्वती नदी के उस तट से, जो वर्तमान में ंबाला से थानेसर, सिरसा और मरुभूमि से लेकर प्रयाग तक है, उसे मध्य देश कहते हैं।
भृगु के अनुसार - जसे उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल, पश्चिम में कुरुक्षेत्र तथा पूर्व में प्रयाग हो, उसे मध्य देश कहते हैं।
वशिष्ठ जी के अनुसार - गंगा और जमना के बीच के भाग को मध्य देश कहते हैं।
इस प्रकार मध्य देश की स्थिति और उसकी सीमाओं में नई-पुरानी भौगोलिक परिभाषाओं का अंतर है। वात्स्यायन के समय में शायद मध्यदेश की सीमा पूर्व में प्रयाग तक, पश्चिम में कुरुक्षेत्र तक तथा उत्तर में कुमायूं तक और दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत तक रही होगी। मध्यदेश की स्त्रियों को कामसूत्र ने प्राय: पवित्र विचारों वाली दर्शाते हुए निम्रलिखित प्रकार का विवरण दिया है।
मध्य देश के निवासी प्राय: आर्य हैं। उनके आचार-विचार अच्छे हैं। वे संभोग के समय गंदी चूमा-चाटी को पसंद नहीं करते। ये गंदी जगह पर चुंबन करने, नाखून लगाने और दांतों से काटने को स्वभाव से ही पसंद नहीं करते। आलिंगन को ये लोग अवश्य पसंद करते हैं।
मध्य देश की स्त्रियां नाखूनों और दांतों के वारों को पसंद नहीं करतीं। इनकी कामवासना कम होती है। इनकी बुद्धि कुटिल नहीं होती तथा ये हल्का-हल्का और मीठा-मीठा संभोग ही पसंद करती हैं।
बाह्नीक तथा अवन्ति
बलख अथात उत्तरापथ को बाह्लीक कहते हैं। उज्ज्यनी अर्थात मालवा को अवन्ति कहते हैं। इन स्थानों की स्त्रियां चुंबर के साथ-साथ नखक्षत और दंत कर्म को सख्त नापसंद करती हैं। ये स्त्रियां भी स्वभाव और व्यवहार से मध्य देश की स्त्रियों जैसी ही होती हैं। अंतर केवल इतना है कि बाल्हीक और अवन्ति के स्त्री-पुरुषों का मन चित्र रतों में अधिक लगता है। इससे उन्हें अधिक प्रसन्नता मिलती है। चित्र-रत क्या है, इसके बारे में आगामी ब्लॉगों में विस्तार से बताऊंगा।
पूर्व मालव और आभीर
पूर्व मालव यानि पंजाब और आभीर यानि मध्य सिंध प्रदेश के स्त्री-पुरुषों को संभोग में अप्राकृतिकता भी प्यारी लगती है। यहां की सुंदरियां आलिंगन, चुंबन, नाखूनां और दांतों से काटने ो विशेष रूप से पसंद करती हैं। परंतु यह नहीं चाहतीं कि इनमें कोई जख्म बने। ये संभोग के समय हल्की-हल्की मार तथा गुप्तांगों को चूमना भी पसंद करती हैं। इनसे इन्हें अधिक तृप्ति मिलती है।
सिंध पंजाब
सिंधु और सतलुज के बीच में रहने वाले स्त्री-पुरुष अप्राकृतिक संभोग क्रियाओं को विशेष रूप से पसंद करते हैं। यहां की स्त्रियां मुख-मैथुन में भी विशेष रुचि लेती हैं।
गुजरात और लाट
गुजरात और इसके आसपास के क्षेत्रों में रहने वाली स्त्रियों में कामवासना बहुत अधिक होती है। ये पुरुष के साथ संभोग करते समय हल्के-हल्के प्रहारों को सह लेती हैं तथा मुंह से सी..सी के शब्द निकालती हैं। इन शब्दों की आवाज हल्की-हल्की होती है।
स्त्री राज्य और कौशल देश
स्त्री राज्य और कौशल देश की स्त्रियो को अधिक खाजवाली कहा गया है। ये बहुत अधिक कामुक होती हैं। संभोग क्रिया में प्रचंड कामाग्रि वाले पुरुष भी प्राय: इन्हें तृप्त नहीं कर प ाते। तब इन्हें कृत्रिम लिंग या डंडे आदि की जरूरत पड़ती है।
आंध्र देश
वात्स्यायन के अनुसार नर्मदा नदी के दक्षिण में दक्षिणपथ देश है, उसमें कर्नाटक देश के पूर्व में आंध्र देश है। इस देश की स्त्रियां प्रकृ िसे कोमल, संभोग प्रिय,श् मंद वेग वाली तथा व्याभिचारिणी हुआ करती हैं। इनकी योनि में हमेशा ही खाज होती रहती है तथा ये हर समय संभोग के लिए लालायिक रहती हैं। इनके अंग कोमल होते हैं, इसलिए ये संभोग के समय हल्की-फुल्की मार-पीट को भी सहन नहीं कर सकतीं। इनका आचार-विचार अच्छा नहीं होता और इनका चरित्र भी बहुत अचछार नहीं होता। ये लोक मर्यादाओं को अधिक महत्व नहीं देतीं। सदा ही अनाचार में लगी रहती हैं। फिर भी इनकी काम भूख नहीं मिटती। ये शर्म-लिहाज नहीं करतीं तथा सदा नए-नए पुरुषों के साथ रंगरेलियां मनाना चाहती हैं।
महाराष्ट्र
नर्मदा नदी और कर्नाटक कके बीच का भू-भाग महाराष्ट्र कहलाता है। इस स्थान की स्त्रियां बहुत सुंदर और चौंसठ कलाओं में अनुराग करने वाली होती हैं। ये अश£ील तथा कठोर वचन बोलना और सुनना पसंद करती हैं और संभोग की शुरुआत बड़े ही जोश-खरोश के साथ करती हैं। जो पुरुष धृष्टता और साहस के साथ इन्हें पाने का प्रयास करते हैं, ये उन्हें ही प्राप्त होती हैं।
इन स्त्रियों में लिंग प्रवेश करनेसे पहले, पुरुष को चाहिए कि वह गणेश-क्रिया का प्रयोग करे अर्थात उगली के प्रयोग से उनकी योनि को द्रवित करे ताकि इन्हें शीघ्र स्खलित किया जा सके।
पटना
पटना की स्त्रियां महाराष्ट्र की स्त्रियों जैसी ही होती हैं। अंतर केवल इतना ही होता है कि ये अश£ील व कठोर वचनों का प्रयोग एकांत में करती हैं। ये भी उन्हीं पुरुषों के हाथ आती हैं, जो धृष्टता तथा साहस का प्रयोग करके इन्हें पाने का प्रयास करते हैं।
द्रविड़ यानि तमिलनाडू
द्रविड़ देश की स्त्रियां केशों को पकडऩे, आलिंगन करने, मुंह में जीभ के प्रवेश, मसलने ओर हल्की-हल्की मार जैसी क्रियाओं को बहुत अधिक पसंद करती हैं। इनका शरीर ओर आवाज दोनों कोमल और सुंदर होते हैं। ये साहस से भरी, निडर तथा निर्लज्ज होती हैं। संभोग के समय ये धीरे-धीरे स्खलित होती रहती हैं तथा एक ही बार की संभोग क्रिया से तृप्त हो जाती हैं।
कोंकण से पूर्व की बनवासिनी
कोंकण देश के पूर्व में बनवास क्षेत्र है। वहां रहने वाली स्त्रियों में मध्यम दर्जे की कामवासना होती है। ये आलिंगन, चुंबन, प्रहार, नखक्षत, दंतक्षत आदि सभी क्रियाओं को सह लेती हैं। इनका शरीर मजबूत होता है।
ये अपने अंगों को ढंककर रखती हैं। दूसरे के अंग में अगर कोई दोष दिखाई देता है, तो उसकी हंसी उड़ाती हैं। जो पुरुष सुंदर नहीं होते या बुरा व्यवहार करने वाले होते हैं, उन्हेंये बिल्कुल पसंद नहीं करतीं, जो अश£ील या कठोर वचनों का प्रयोग करते हैं, उन्हें ये छोडक़र चली जाती हैं।
गौड यानि पश्चिमी व उत्तरी बंगाल
गौड देश की स्त्रियां कोमल अंगों वाली, मीठा बोलने वाली तथा अपने पति से प्रेम करने वाली होती हैं।
स्थान से स्वभाव का अधिक महत्व है
इस बारे में आचार्य सुवर्णनाभ कहते हैं कि स्थान का स्वभाव का महत्व अधिक होता है। जो क्रियाएं स्थान और स्वभाव के अनुकूल हों, वही करनी चाहिएं। इनमें से जो भी स्वभाव के अधिक अनुकूल हों, वहीं करनी चाहिएं। स्थान के बंधन में बंधे रहना बुद्धिमानी नहीं है।
एक स्थान की बातें दूसरे में
आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि जैसे-जैसे समय बदलता है, एक स्थान के रिवाज, व्यवहार, पहनावा तथा प्रेम-क्रीड़ाओं के ढंग एक स्थान से से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। इसलिए यह नहीं समझना चाहिए कि कामसूत्र में जिस देश के आचार-व्यवहार का वर्णन है, वह समय बीतने पर इस समय भी जारी हो सकता है।
वासना को बढ़ाने वाला
आलिंगन, चुंबन, नखच्छेद, दंत कर्म, मारपीट और सीत्कार - ये छह प्रकार की बाहरी क्रियाएं होती हैं। इन सभी में जो क्रिया सबसे अधिक कामवासना को भडक़ाने वाली है, वह है सीत्कार। संभोग के समय जब स्त्री धीरे-धीरे सी...सी की आवाज करती है, तो पुरुष पूरी तरह से जोश में आ जाता है।
आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि संभोग के समय हल्की-हल्की मारपीट जोश को बढ़ाती है। इससे भी अधिक जोश दांतों को लगाने से आता है। दंतछेद से अधिक जोश बढ़ता है नखच्छेद से। नखच्छेद से भी ज्यादा जोश चुंबन दिलाता है। चुंबन से भी अधिक जोश दिलाता है आलिंगन। ओर इन सबसे अधिक जोश दिलाता है सीत्कार का शब्द। यह एक ऐसी क्रिया है, जिसका विवरण शब्दों में नहीं समझाया जा सकता।
एकांत में यह करें
यदि स्त्री के मना करने के बाद भी पुरुश उसे नाखूनों से नोचे या दांतों से काटे तो स्त्री को चाहिए कि वह उसे दोगुना काटे। इस तरह उसे अपने गुस्से का प्रदर्शन करना चाहिए तथा बदला लेना चाहिए। यह जो उपदेश दिया गया है, उसका ढंग यह है कि यदि पुरुष दांतों से बिदु बनाए तो स्त्री बिंदुमाला बना दे। इसी प्रकार बिंदुमाला के बदले में अभ्रखण्डक बना दे।
इतना कुछ करने के बाद एक हाथ से पुरुष के सिर के बाल पकड़ ले और दूसरे हाथ उसे उसकी ठोड़ी को पकडक़र, उसके नीचे के होंठ को चूसते हुए इतनी जोर से उसका आलिंगन करे कि पुरुष को ऐसा लगने लगे कि वह उसके भीतर ही घुस जाएगी। उसके बाद जब जोश अधिक बढ़ जाए तो पुरुष के भिन्न-भिन्न अंगों को दांतों से काटे।
दूसरा ढंग ये है
अपने प्रियतम की छाती पर बैठकर एक हाथ से उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाए, दूसरे हाथ से बलबांही उालकर उसकी गर्दन पर अपने दांतों द्वारा दंत कर्म करे।
प्रकाश में यह करे
पीछे एकांत में करने लायक क्रियाएं बताई गई हैं। जब प्रकाश में करने वाली क्रियाएं बताते हैं, जिनसे आपस का प्रेम बढ़ता है।
दिन में या रात में जब भी मौका हो, ऐसे समय में, जब लोगों की भीड़ हो, नायिका इशारों से नायक को यह समझाए - मैंने तुम्हारे शरीर पर जो नाखूनों ओर दांतों से निशान बनाए थे, वे दिखाईदे रहे हैं। इन्हें ढंक लो।
इस प्रकार के इशारों मं यह व्यंग्य छिपा हुआ होना चाहिए कि -दुष्टतता का यही दंड है। न तुम मुझे काटते और न ही मैं तुम्हें काटती। इस प्रकार स्त्री अपने शरीर पर बने निशानों की ओर भी संकेत कर सकती है।
जिस प्रकार चुंबन लेने के लिए मुंह बनाया जाता है, उसी प्रकार अपना मुंह बनाकर चालाकी से भौंहें मटकाकर उसे डराए। ऐसा संकेत दे - जिस तरह तुमने ये निशान बनाए हैं, उसी प्रकार मैं भी बनाऊंगी। तुम्हें छोडूंगी नहीं।
जीवन में रस बनाए रखने के लिए, जो स्त्री-पुरुष परस्पर प्रेम रखते हुए और लज्जा का भाव रखते हुए इन क्रियाओं का प्रयोग करते हैं, उनका प्रेम सौ वर्ष में भी कम नहीं हो सकता।
अब अगले ब्लॉग में मैं आपको संभोग क्रिया के विविध आसनों के बारे में प्रकाश डालूंगा। इन आसनों का प्रयोग करके संभोग क्रिया के आनंद को बढ़ाया जा सकता है तथा तृप्त हुआ जा सकता है।
Copywrite : J.K.Verma Writer
Contact : 9996666769
jkverma777@gmail.com
टिप्पणियाँ